Friday, August 2, 2013

गरीब की थाली या गरीब को गाली।।।

गौर से देखने पर संसद के अकार में एक अष्ट भोग थाली दिखती है… 
और जनता के इस आकाल मे एक खाली थाली दिखती है… 
जिस दौर मे देश की बोली लगती है…
हो महंगाई कितनी भी, औरत की इज्ज़त बिकती है…
कलयुग मे काले  धन के धान सजती है…
भ्रष्टाचार की धीमी आंच पर सत्ता की रोटी सिकती है…
ऐसे ही एक दौर मे  गरीब की थाली खाली सजती है…
जिनकी तिजोरी भरी पड़ी, उनको खाली पेट का क्या अनुमान।।।
जिनकी टोपी मैली हुई, उनको दो वक़्त की रोटी का क्या सम्मान।।।
गौर से देखने पर संसद के अकार में एक अष्ट भोग थाली दिखती है… 
और जनता के इस आकाल मे एक खाली थाली दिखती है… 

गरीब की थाली या गरीब को गाली।।।
गरीबों की थाली की कीमत अब 1 रुपये लगाई गई है। एक वक्त के खाने की कीमत 1 रूपये। जी हां  मात्र एक रूपये। ये कोई लुभावनी सेल स्कीम या कोई ऑफर नहीं है, बल्कि सरकार का गरीबो को लेकर एक नया फरमान है. लम्बे वक़्त से खुद को ठगा हुआ महसूस करने वाला देश का गरीब, अब ना सिर्फ  खुद को मुख्यधारा से और दूर पाएगा बल्कि खुद को अपमानित भी महसूस करेगा. देश का गरीब किसान, मजदूर जो पहले से ही महंगाई की मार से त्राहि त्राहि कर रहा है, गरीबी और शोषण के एक मक्कड़ जाल से खुद को आज़ाद कराने की कोशिश कर रहा है. एक ऐसा समय जब खुले पानी की कीमत दो रूपये प्रति गिलास है, ऐसे मे एक रूपये मे एक वक़्त का खाना जुटाना तो दूर, सोचना भी अतिश्योक्ति होगा.
  
कुछ समय पहले भी योजना आयोग ने 33 रुपये आय वालों को गरीब मानने से इनकार कर दिया थ. शायद कुछ इन्ही मनमाने आंकड़ो को सही साबित करने की इस होड़ मे लगातार ऐसी दलीले पेश हो रही है. 
 योजना आयोग के जरिए केन्द्र सरकार ने जो गरीब होने की परिभाषा तय करने का हलफनामा दिया है उसे पढ़ कर न सिर्फ अजूबा सा लगता है साथ ही हंसी भी आती है. 
 अपने प्रिय सांसदों की बात करे तो 1954 के बाद से अब तक सांसदों के वेतन और भत्तों में 27 बार संशोधन हो चुका है। 2005 में 12 हजार वेतन लेने वाले सांसद अब 50 हजार रूपए प्रतिमाह वेतन लेते है। जबकि 2004 में की दर से हर माह 579 रूपए कमाने वाले को बीपीएल माना गया था जिसकी सीमा बढ़ कर आयोग ने सिर्फ 965 रूपए कर दी है।

गरीब कौन है? वो सांसद जिस पर वेतन के साथ करीब 15 सुविधाओं के लिए सालाना करीब 45 लाख रूपए खर्च होता है या वो जो माह में पाँच हजार की कमाई करता है? सरकार हमेशा ही आँकड़ो में विकास नापती रही है अमीरी-गरीबी को भी आँकड़ों की बाजीगरी मे उलझाती आई है। सरकार गरीबों के साथ आँकड़ों की बाजीगरी इसलिए भी कर रही हैं क्योंकि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को रियायती योजनाओं से दूर रखना चाहती है. दराह्सल सरकार की नियत मे साफ़ खोट दिखता है. सरकार की दिलचस्पी अपना खजाना भरने मे तो है, फिर चाहे गरीब का पेट भरे ना भरे. 

Saransh Rashdeep Jain

Wednesday, January 16, 2013

PROGRAMME QUESTIONING INDIA AS A REPUBLIC

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PROGRAMME ON NARENDRA MODI AND COMMENTS MADE ON HIM BY THE GUJARAT HC

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